Thursday, June 14, 2018

                    अश्वत्थामा अवतार 
अश्वत्थामा का जन्म भारद्वाज ऋषि के पुत्र द्रोणाचार्य के घर हुआ था। उनकी माता ऋषि शरद्वान की पुत्री कृपी थीं। द्रोणाचार्य का गोत्र अंगिरा था। अपने पितरों की आज्ञा से संतान प्राप्ति हेतु द्रोणाचार्य ने कृपी से विवाह किया। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर भगवान शिव ने अपने अंश से द्रोणाचार्य के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। कर्मों का लेख भी बढ़ा विचित्र है। कभी-कभी देव कृपा से जब पाप पुण्य समांतर चलते हैं तो जीवन की दशा भी अलग दिशा में खींच ले जाती है। लेकिन जहां पाप कर्मों का बोझ मन पर भारी होता है तो बंदे को शांति कहीं नहीं मिलती और पाप उसे अशांत ही रखता हैं। इसे कुछ इस तरह भी देखा जा सकता है, जैसे कि देवों और असुरों के समुद्र मंथन का संघर्ष जिसमें चौदह रत्न प्रकट हुए । ऐसे ही हमारे मन में भी समुद्र मंथन की तरह उथल-पुथल चलती है। है। पाप और पुण्य में सिर्फ अंतर इतना है की पुण्य उसे सन्मार्ग  और पाप उसे कुमार्ग की ओर ले जाता हैं। हमें वर्तमान जन्म में सद्कर्मों या पाप कर्मों की तरफ अनायास ही खींच ले जाते हैं। इस संदर्भ में महाभारत युद्ध में गीता ज्ञान देते हुए भगवान श्री कृष्ण का कथन है अगर अर्जुन तुम युद्ध नहीं करना चाहते फिर भी तुम अपने जन्म-जन्मांतर के प्रेरित गुण-धर्म-संस्कारों के बहाव से आखिर युद्ध करने के लिए बिवश हो जाओ गए। 
फिर श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा, ‘‘हे अर्जुन! धर्मात्मा, अज्ञानी, रथहीन, सोए हुए, मतवाले, पागल, बालक तथा स्त्री को मारना धर्म के अनुसार वर्जित है। इसने धर्म के विरुद्ध आचरण किया है, सोए हुए बालकों की हत्या की है। जीवित रहेगा तो पुन: पाप करेगा। अत: तत्काल इसका वध करके और कटा हुआ सिर द्रौपदी के सामने रख कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो।’’
श्री कृष्ण के इन वचनों को सुनकर अर्जुन को अपने गुरु पुत्र पर दया आ गई और अश्वत्थामा को जीवित ही शिविर में ले जाकर द्रौपदी के समक्ष खड़ा कर दिया। पशु की तरह बंधे हुए गुरु पुत्र को देखकर द्रौपदी ने कहा, हे आर्यपुत्र यह गुरु पुत्र है। आपने इनके पिता से शस्त्रास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है। पुत्र के रूप में आचार्य द्रोण ही आपके सम्मुख बंदी रूप में खड़े हैं। इनका वध करने से इनकी माता कृपी मेरी तरह ही पुत्र शोक में विलाप करेगी। कृपी की आत्मा निरंतर मुझे कोसेगी। इनके वध करने से मेरे मृत पुत्र लौटकर तो नहीं आ सकते। आप इन्हें मुक्त कर दीजिए।’’ इस पर श्री कृष्ण ने कहा, ‘‘हे अर्जुन! शास्त्रों के अनुसार आततायी को दंड न देना पाप है अत: तुम वही करो जो उचित है।’’ फिर अर्जुन ने अपनी तलवार से अश्वत्थामा के सिर के केश काट डाले और उसके मस्तक की मणि निकाल ली। मणि निकल जाने से वह श्रीहीन हो गया। बाद में श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को 6 हजार साल तक भटकने का शाप दिया।
इसमें जीवन का सत्य छिपा है। सहस्त्रों हाथियों का बल है इस मन में, जो साधारण आदमी को भी विचलित देता है, कहीं से कहीं लाकर कुछ भी करवा सकता है। अब देखिए महाभारत के नायक अश्वत्थामा उन सात संजीवन देवों में शामिल हैं जिनकी प्रात:काल आयु वृद्धि के लिए मंत्र से पूजा की जाती है। वह अश्वत्थामा अजर अमर है परन्तु श्राप व अपने पाप के कारण अपने घावों से बेचैन पृथ्वी पर मारा-मारा फिरता है।

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मेरे जीवन में शिव जी का एक एहम स्थान है। मैं अपना सारा जीवन उनकी भगती में कुर्बान कर देना चाहता हूँ। उन्हों ने मेरे हर अच्छे बुरे बक्त में मेरा साथ दिया है। मेरे शिव भोले तो मेरी जान से भी प्यारे है। मै जब भी उनका जाप करता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है की वो मेरे साथ ही है। मेरा जीवन उनके बिना अधूरा है। मेरे शिव कालों के काल महाकाल है। उनकी लिला अपरम पार है।
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