भैरव अवतार
पुरे भारत देश मे शिव अवतार भैरव नाम को कई नामों से जाना जाता है जैसे की काला भैरव, काल भैरव, अन्नधाणी भैरव, भैरोन या भैर्या के नाम से जाना जाता है। भैरव का उद्गम भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच की बातचीत को "शिव महा पुराण" में वर्णित किया गया है भगवान शिव ने ऐसी माया रचाई जिसके अधीन होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे। जब वेदों से पूछा गया की आप बताएं कौन सर्वश्रेष्ठ है तो उन्होंने कहा भगवान शिव।
ब्रह्मा व विष्णु ने वेदों का विरोध किया। उसी समय तेजपुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखी। उसे देखते ही ब्रह्मा जी बोले,"चंद्रशेखर आप मेरे पुत्र हैं। अत: मेरे आश्रय में आ जाएं। ब्रह्मा जी के मुख से ऐसे वचन सुनकर भगवान शिव को गुस्सा आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। काल भी आप से भय खाएगा इसलिए आप काल भैरव कहलाएंगे और भगवान शिव से वर प्राप्त करके कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया। अत: उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लग गया। उसी समय वहां ब्रह्महत्या उत्पन्न हुई और काल भैरव का पीछा करने लगी।, जब तक कि भैरव ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त नहीं हो जायेंगे । तब भगवान शिव ने ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने के लिए भैरव को निर्देश दिया,जब तक यह कन्या(ब्रह्महत्या) वाराणसी पहुंचे, तब भयंकर रूप धार कर आप इसके आगे चले जाना। वाराणसी पहुंच कर तुम्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिलेगी। सर्वत्र विचरण करते हुए जब भैरव ने विमुक्त नगरी वाराणसी में प्रवेश किया तो उसी क्षण ब्रह्महत्या पाताल चली गई और भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई।
पुरे भारत देश मे शिव अवतार भैरव नाम को कई नामों से जाना जाता है जैसे की काला भैरव, काल भैरव, अन्नधाणी भैरव, भैरोन या भैर्या के नाम से जाना जाता है। भैरव का उद्गम भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच की बातचीत को "शिव महा पुराण" में वर्णित किया गया है भगवान शिव ने ऐसी माया रचाई जिसके अधीन होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे। जब वेदों से पूछा गया की आप बताएं कौन सर्वश्रेष्ठ है तो उन्होंने कहा भगवान शिव।
ब्रह्मा व विष्णु ने वेदों का विरोध किया। उसी समय तेजपुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखी। उसे देखते ही ब्रह्मा जी बोले,"चंद्रशेखर आप मेरे पुत्र हैं। अत: मेरे आश्रय में आ जाएं। ब्रह्मा जी के मुख से ऐसे वचन सुनकर भगवान शिव को गुस्सा आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। काल भी आप से भय खाएगा इसलिए आप काल भैरव कहलाएंगे और भगवान शिव से वर प्राप्त करके कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया। अत: उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लग गया। उसी समय वहां ब्रह्महत्या उत्पन्न हुई और काल भैरव का पीछा करने लगी।, जब तक कि भैरव ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त नहीं हो जायेंगे । तब भगवान शिव ने ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने के लिए भैरव को निर्देश दिया,जब तक यह कन्या(ब्रह्महत्या) वाराणसी पहुंचे, तब भयंकर रूप धार कर आप इसके आगे चले जाना। वाराणसी पहुंच कर तुम्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिलेगी। सर्वत्र विचरण करते हुए जब भैरव ने विमुक्त नगरी वाराणसी में प्रवेश किया तो उसी क्षण ब्रह्महत्या पाताल चली गई और भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई।



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