Thursday, June 14, 2018

दुर्वासा अवतार :
भगवान शिव के विभिन्न अवतारों में ऋषि दुर्वासा का अवतार भी प्रमुख है।दुर्वासा सतयुग, त्रैता एवं द्वापर तीनों युगों के एक प्रसिद्ध सिद्ध योगी महर्षि हैं। वे सब प्रकार के लौकिक वरदान देने में समर्थ हैं। वे महादेव शिव के अंश से आविर्भूत हुए हैं। कभी-कभी उनमें अकारण ही भयंकर क्रोध भी देखा जाता है। ऋषि दुर्वासा अत्यधिक क्रोधी स्वभाव के थे। छोटी-छोटी बातों से नाराज होकर वे श्राप दे देते थे। इस अवतार से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कभी भी अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। शक्ति का दुरुपयोग करने से स्वयं का बल भी क्षीण होता है। क्रोध पर नियंत्रण रखकर ही हम सभी के विश्वासपात्र तथा स्नेही बन सकते हैं। अत: भगवान शंकर के ऋषि दुर्वासा अवतार से हमें क्रोधी न बनने की सीख लेनी चाहिए।  धर्म ग्रंथों के अनुसार सती अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने ब्रह्मा के निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्रकामना से घोर तप किया। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके आश्रम पर आए। उन्होंने कहा- हमारे अंश से तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकी में विख्यात तथा माता-पिता का यश बढ़ाने वाले होंगे। समय आने पर ब्रह्माजी के अंश से चंद्रमा उत्पन्न हुए। विष्णु के अंश से श्रेष्ठ संन्यास पद्धति को प्रचलित करने वाले दत्तात्रेय उत्पन्न हुए और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया।ब्रज मण्डल के अंतर्गत प्रमुख बारह वनों में से लोहवनके अंतर्गत यमुना के किनारे मथुरा में दुर्वासाजी का अत्यन्त प्राचीन आश्रम है। यह महर्षि दुर्वासा की सिद्ध तपस्या स्थली एवं तीनों युगों का प्रसिद्ध आश्रम है। भारत के समस्त भागों से लोग इस आश्रम का दर्शन करने और तरह-तरह की लौकिक कामनाओं की पूर्ति करने के लिए आते हैं।

गृहपति अवतार :
भगवान शंकर का सातवां अवतार ‘’गृहपति अवतार’’ का बहुत महत्त्व है। इस अवतार को अग्न्यवतार भी कहा जाता है। इस अवतार से हमें ये सन्देश मिलता है। हम जो भी कार्य करें उसके केंद्र में भगवान को अवश्य रखें। अर्थात: यदि हम सिर्फ भोजन प्राप्ति के लिए भी कोई कार्य कर रहे हैं तो उसका माध्यम पवित्र तथा धर्म के अनुसार होना चाहिए। इस कार्य में किसी का अहित नहीं होना चाहिए। तभी हमारा कार्य सफल होगा। वेद और पुराणों के अनुसार हमारे शरीर में स्थित जठराग्नि(भूख) ही भगवान शिव का गृहपति अवतार है। भूख लगने पर हम जो अन्न ग्रहण करते हैं उसी से हमारे शरीर का पोषण हो
ता है तथा हमारे शरीर में स्थित सुक्ष्म प्राणों को संतुष्टि प्राप्त होती है। हम जठराग्नि को शांत करने के लिए जो भी कार्य करें वह धर्म के अनुसार हो। यही इस अवतार का मूल संदेश है।
इनके अवतार की कथा बहुत रोचक और शिक्षाप्रद है। इसकी कथा इस प्रकार है; प्राचीन काल मे - नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। । शुचिष्मती ने बहुत काल तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से महेश्वर  शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। मुनिवर अपनी पत्नी को आश्वासन देकर शिव जी की आराधना करने के लिए काशी की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँच कर, उन्होंने वीरेश लिंग की त्रिकाल अर्चना करते हुए घोर तप किया। एक वर्ष के बाद उन्हें शिवलिंग के मध्य एक अष्टवर्षीय विभूति-विभूषित बालक दिखायी दिया। उसका स्वरूप शिव जी के ही समान था। मुनिवर ने उन्हें भगवान
 शिव जानकर "अभिलाषाष्टक स्तोत्र" द्वारा उनकी स्तुति की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। इसी वरदान के परिणाम स्वरूप भगवान  शिव जी शुचिष्मती के गर्भ से पुत्र रूप मे अवतरित हुए। उस समय उनका नाम गृहपति रखा गया। कहते हैं पितामह ब्रह्मा ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था। एक बार गृहपति का दर्शन करने के लिए नारद जी आये। उन्होने गृहपति को देखकर बताया कि; यह बालक सर्वगुण सम्पन्न है किन्तु बारह वर्ष की आयु में इसे बिजली अथवा अग्नि द्वारा भय उत्पन्न होगा। इसे सुनकर विश्वानर मुनि रोने लगे। उस समय गृहपति ने अपने माता-पिता को आश्वासन देते हुए कहा कि; मैं भगवान शिव के मृत्युञ्जय के जाप से महाकाल को भी जीत लूँगा। अतः आप लोग निश्चिन्त रहें। इसके बाद गृहपति काशी गये और भगवान विश्वनाथ का दर्शन किया ।उसके बाद शुभ मुहूर्त मे शिवलिंग की स्थापना करके उनकी आराधना करने लगे। कुछ समय बाद देवराज इन्द्र प्रकट हुए और उनसे वर माँगने को कहा। गृहपति ने उन्हें दुत्कारते हुए कहा कि; तुम दुराचारी हो। मैं तुमसे वर-याचना नहीं करूँगा। मेरे वरदायक केवल शिव जी ही हैं। इसे सुनकर इन्द्र बहुत क्रोधित हो गए। उसने वज्र से प्रहार करना चाहा। उसी समय शिव जी प्रकट हो गये। उन्होंने बताया कि; इन्द्र रूप में प्रकट होकर, मैं ही तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। तुम उस परीक्षा में सफल हो गये हो। अब तुम्हारे ऊपर यमराज का भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह शिवलिंग "अग्नीश्वर" नाम से प्रसिद्ध होगा। इनका दर्शन करने से मनुष्य बिजली और अग्नि से भयभीत एवं पीड़ित नहीं होगा। यहां पर “शिव अभिलाषाष्टक स्तोत्र” का वर्णन किया जा रहा है। जिसके जप करने से मनुष्य सन्तान की प्राप्ति कर सकता है। ऋषि विश्वानर ने स्वयं 12 महीने तक फलाहार, जलाहार एवं वायु के आधार पर प्रस्तुत “शिव अभिलाषाष्टक स्तोत्र” के द्वारा पुत्ररत्न की प्राप्ति की थी।
"श्री शिव अभिलाषाष्टक स्त्रोत्र"

एकं ब्रह्मैवऽऽद्वितीयं समस्तं सत्यं
सत्यं नेह नानास्ति किञ्चित् ।
एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्थे
तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये सदाहम् ॥ १॥

एकः कर्ता त्वं हि सर्वस्य शम्भो
नाना रूपेषु एकरूपोसि अरूपः ।
यद्वत् प्रत्यप्सु अर्कः एकोपि अनेकः
तस्मात् नान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये ॥ २॥

रज्जौ सर्पः शुक्तिकायां च रूप्यं
नरः पूरः तन्मृगाख्ये मरीचौ ।
यद्वत् तद्वत् विष्वक् एषः प्रपञ्चः
यस्मिन् ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशं ॥ ३॥

तोये शैत्यं दाहकत्वं च वन्हौ
तापो भानौ शीत भानौ प्रसादः ।
पुष्पे गण्धः दुग्ध मध्येऽपि सर्पिः
यत्तत् शम्भो त्वं ततः त्वां प्रपद्ये ॥ ४॥

शब्दं गृण्हासि अश्रवाः त्वं हि जिघ्रेः
अग्राणः त्वं व्यङ्घ्रिः आयासि दूरात् ।
व्यक्षः पश्येः त्वं रसज्ञोऽपि अजिह्वः
कः त्वां सम्यक् वेत्ति अतः त्वां प्रपद्ये ॥ ५॥

नो वेद त्वां ईश साक्षात् विवेद
नो वा विष्णुः नो विधाताऽखिलस्य ।
नो योगीन्द्राः नेन्द्र मुख्याश्च देवाः
भक्तो वेदत्वां अतस्त्वां प्रपद्ये ॥ ६॥

नो ते गोत्रं नेश जन्मापि नाख्या
नोवा रूपं नैव शीलं न तेजः ।
इत्थं भूतोपि ईश्वरः त्वं त्रिलोख्याः
सर्वान् कामान् पूरयेः तत् भजेहम् ॥ ७॥

त्वत्तः सर्वं त्वहि सर्वं स्मरारे
त्वं गौरीशः त्वं च नग्नः  अतिशान्तः ।
त्वं  वै वृद्धः त्वं युवा त्वं च बालः
तत्वं यत्किं नासि अतः त्वां नतोस्मि ॥ ८॥

"इति श्री शिव अभिलाषाष्टक स्त्रोत्र संपूर्ण:"

अतः संतान इच्छुक मनुष्य को विधिवत् यम नियमों का पालन करते हुए आठ श्लोकों वाले स्तोत्र के नित्य 108 पाठ एक वर्ष तक करने चाहिये। माता-पिता दोनों संयुक्त साधना करें तो शीघ्र कार्य सिद्ध होता है।

शारभा अवतार


भगवान शिव का शरभावतार छटा अवतार है । शरभावतार में भगवान शिव का स्वरूप आधा मृग / हिरण तथा शेष शरभ पक्षी का था। संस्कृत साहित्य के अनुसार, पुराणों में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर और हाथी से अधिक शक्तिशाली है। शारभा को स्वर्ण रंग के साथ एक पक्षी के रूप में वर्णित किया गया है, जिसमें दो उत्थान पंख, दो लाल आँखें, जमीन को छूने वाले शेर के रूप में चार पैर, पंजे ऊपर की तरफ, और एक जानवर पूंछ के साथ। शरीर के शीर्ष भाग को मानव के रूप में दिखाया गया है। श्रीत्त्वविनी में, शारेशेश्वरमूर्ति के लिए निर्धारित चित्रण तीस हथियारों की है; दाईं तरफ हथियार, वज्र, मुश्ती, अभय, चक्र (डिस्कस), शक्ति, कर्मचारी, पुरूष, तलवार, खतवंगा, कुल्हाड़ी, अक्षमाल, एक हड्डी, धनुष, मुसाला और आग पकड़ने वाले हैं; और बाएं हाथ एक गले में दुर्गा को घेरे हुए एक हाथ से फंदा, वरदा, गदा, तीर, झंडा, और एक अन्य प्रकार की तलवार, एक सांप, कमल के फूल, खोपड़ी-कप, पुस्ताका, हल, और मुरुंगा धारण किया है।  इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था। लिंगपुराण में शिव के शरभावतार की कथा है, उसके अनुसार-  हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता भगवान शिवजी के पास पहुंचे। तब भगवान शिव ने शरभावतार लिया और वे इसी रूप में भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की, लेकिन नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई। यह देखकर शरभ रूपी भगवान शिव अपनी पूंछ से नृसिंह को लपेटकर ले उड़े। तब कहीं जाकर भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।


                    अश्वत्थामा अवतार 
अश्वत्थामा का जन्म भारद्वाज ऋषि के पुत्र द्रोणाचार्य के घर हुआ था। उनकी माता ऋषि शरद्वान की पुत्री कृपी थीं। द्रोणाचार्य का गोत्र अंगिरा था। अपने पितरों की आज्ञा से संतान प्राप्ति हेतु द्रोणाचार्य ने कृपी से विवाह किया। आचार्य द्रोण ने भगवान शंकर को पुत्र रूप में पाने की लिए घोर तपस्या की थी और भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप मे अवतीर्ण होंगे। समय आने पर भगवान शिव ने अपने अंश से द्रोणाचार्य के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में अवतार लिया। कर्मों का लेख भी बढ़ा विचित्र है। कभी-कभी देव कृपा से जब पाप पुण्य समांतर चलते हैं तो जीवन की दशा भी अलग दिशा में खींच ले जाती है। लेकिन जहां पाप कर्मों का बोझ मन पर भारी होता है तो बंदे को शांति कहीं नहीं मिलती और पाप उसे अशांत ही रखता हैं। इसे कुछ इस तरह भी देखा जा सकता है, जैसे कि देवों और असुरों के समुद्र मंथन का संघर्ष जिसमें चौदह रत्न प्रकट हुए । ऐसे ही हमारे मन में भी समुद्र मंथन की तरह उथल-पुथल चलती है। है। पाप और पुण्य में सिर्फ अंतर इतना है की पुण्य उसे सन्मार्ग  और पाप उसे कुमार्ग की ओर ले जाता हैं। हमें वर्तमान जन्म में सद्कर्मों या पाप कर्मों की तरफ अनायास ही खींच ले जाते हैं। इस संदर्भ में महाभारत युद्ध में गीता ज्ञान देते हुए भगवान श्री कृष्ण का कथन है अगर अर्जुन तुम युद्ध नहीं करना चाहते फिर भी तुम अपने जन्म-जन्मांतर के प्रेरित गुण-धर्म-संस्कारों के बहाव से आखिर युद्ध करने के लिए बिवश हो जाओ गए। 
फिर श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा, ‘‘हे अर्जुन! धर्मात्मा, अज्ञानी, रथहीन, सोए हुए, मतवाले, पागल, बालक तथा स्त्री को मारना धर्म के अनुसार वर्जित है। इसने धर्म के विरुद्ध आचरण किया है, सोए हुए बालकों की हत्या की है। जीवित रहेगा तो पुन: पाप करेगा। अत: तत्काल इसका वध करके और कटा हुआ सिर द्रौपदी के सामने रख कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो।’’
श्री कृष्ण के इन वचनों को सुनकर अर्जुन को अपने गुरु पुत्र पर दया आ गई और अश्वत्थामा को जीवित ही शिविर में ले जाकर द्रौपदी के समक्ष खड़ा कर दिया। पशु की तरह बंधे हुए गुरु पुत्र को देखकर द्रौपदी ने कहा, हे आर्यपुत्र यह गुरु पुत्र है। आपने इनके पिता से शस्त्रास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है। पुत्र के रूप में आचार्य द्रोण ही आपके सम्मुख बंदी रूप में खड़े हैं। इनका वध करने से इनकी माता कृपी मेरी तरह ही पुत्र शोक में विलाप करेगी। कृपी की आत्मा निरंतर मुझे कोसेगी। इनके वध करने से मेरे मृत पुत्र लौटकर तो नहीं आ सकते। आप इन्हें मुक्त कर दीजिए।’’ इस पर श्री कृष्ण ने कहा, ‘‘हे अर्जुन! शास्त्रों के अनुसार आततायी को दंड न देना पाप है अत: तुम वही करो जो उचित है।’’ फिर अर्जुन ने अपनी तलवार से अश्वत्थामा के सिर के केश काट डाले और उसके मस्तक की मणि निकाल ली। मणि निकल जाने से वह श्रीहीन हो गया। बाद में श्री कृष्ण ने अश्वत्थामा को 6 हजार साल तक भटकने का शाप दिया।
इसमें जीवन का सत्य छिपा है। सहस्त्रों हाथियों का बल है इस मन में, जो साधारण आदमी को भी विचलित देता है, कहीं से कहीं लाकर कुछ भी करवा सकता है। अब देखिए महाभारत के नायक अश्वत्थामा उन सात संजीवन देवों में शामिल हैं जिनकी प्रात:काल आयु वृद्धि के लिए मंत्र से पूजा की जाती है। वह अश्वत्थामा अजर अमर है परन्तु श्राप व अपने पाप के कारण अपने घावों से बेचैन पृथ्वी पर मारा-मारा फिरता है।

भैरव अवतार
पुरे भारत देश मे शिव अवतार भैरव नाम को कई नामों से जाना जाता है जैसे की काला भैरवकाल भैरवअन्नधाणी भैरवभैरोन या भैर्या के नाम से जाना जाता है। भैरव का उद्गम भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच की बातचीत को "शिव महा पुराणमें वर्णित किया गया है भगवान शिव ने ऐसी माया रचाई जिसके अधीन होकर ब्रह्मा व विष्णु स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे। जब वेदों से पूछा गया की आप बताएं कौन सर्वश्रेष्ठ है तो उन्होंने कहा भगवान शिव। 


ब्रह्मा व विष्णु ने वेदों का विरोध किया। उसी समय तेजपुंज के मध्य एक पुरुषाकृति दिखी। उसे देखते ही ब्रह्मा जी बोले,"चंद्रशेखर आप मेरे पुत्र हैं। अत: मेरे आश्रय में आ जाएं। ब्रह्मा जी के मुख से ऐसे वचन सुनकर भगवान शिव को गुस्सा आ गया। उन्होंने उस पुरुषाकृति से कहा- काल की भांति शोभित होने के कारण आप साक्षात कालराज हैं। भीषण होने से भैरव हैं। काल भी आप से भय खाएगा इसलिए आप काल भैरव कहलाएंगे  और भगवान शिव से वर प्राप्त करके कालभैरव ने अपनी अंगुली के नाखून से ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया। अत: उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लग गया। उसी समय वहां ब्रह्महत्या उत्पन्न हुई और काल भैरव का पीछा करने लगी।, जब तक कि भैरव ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त नहीं हो जायेंगे । तब भगवान शिव ने ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने के लिए भैरव को निर्देश दिया,जब तक यह कन्या(ब्रह्महत्या) वाराणसी पहुंचे, तब भयंकर रूप धार कर आप इसके आगे चले जाना। वाराणसी पहुंच कर तुम्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिलेगी। सर्वत्र विचरण करते हुए जब भैरव ने विमुक्त नगरी वाराणसी में प्रवेश किया तो उसी क्षण ब्रह्महत्या पाताल चली गई और भैरव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई।


वीरभद्र अवतार - सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थी जब सती बढ़ी हुई तो वे शिव के प्यार में लीन हो गयी। जब प्रजापति दक्ष को सती के प्रेम की बात का पता चला तो दक्ष ने इस प्रेम का कड़ा विरोध किया।
वीरभद्र अवतार 
क्योकि दक्ष शिव को अपना दुश्मन मानता था। फिर भी सती और शिव का विवाह हो जाता हैएक दिन दक्ष ने एक महान यज्ञ के लिए व्यवस्था की, और दक्ष ने सभी देवताओं को आमंत्रित किया केवल शिव सती को छोड़कर। सती अपने माता-पिता के प्रति स्नेह के कारण अपने घर जाने का आग्रह करती है किन्तु शिव जाने से मना कर देते है लेकिन माता सती   फिर भी अपने पिता के यज्ञ में चली जाती है, जब सती वहा पहुंची तो दक्ष ने उसे और शिव को बहुत अपमानित किया दूसरों के सामने, किन्तु सती ये सहन नही कर पायी और दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में माता सती ने अपनी देह का त्याग कर दिया । जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने क्रोध में अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और उसे रोषपूर्वक पर्वत के ऊपर पटक दिया। उस जटा के पूर्वभाग से महाभंयकर वीरभद्र प्रगट हुए। शिव के इस अवतार ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काटकर उसे मृत्युदंड दिया।


नंदी अवतार - देश में किसी भी शिव मंदिर में प्रवेश करें और आप पहले चुपचाप भरे नंदी, भगवान शिव के पर्वत और दिव्य द्वारपाल की प्रतिमा का साक्षी करेंगे। भारत देश में कुछ मंदिर ऐसे हैं जो विशेष रूप से नंदी के लिए बनाए गए हैं। कर्नाटक में प्रसिद्ध नंदीस्वर मंदिर एक ऐसा ही है। भगवान शिव पृथ्वी पर सभी प्राणियों
 नंदी अवतार
  का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान शंकर का नंदीश्वर अवतार भी इसी बात का अनुसरण करते हुए सभी जीवों से प्रेम का संदेश देता है। नंदी (बैल) कर्म का प्रतीक है, जिसका अर्थ है कर्म ही जीवन का मूल मंत्र है। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने शिलाद से संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद ने अयोनिज और मृत्युहीन संतान की कामना से भगवान शिव की तपस्या की। तब भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के यहां नंदी को पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को भूमि में से उत्पन्न एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। भगवान शंकर ने नंदी को अपना गणाध्यक्ष बनाया था। इस तरह नंदी रूप में उन्हें नंदिकेश्वर के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार भारत देश में शिव के साथ लोग नंदी की पूजा होती है।

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मेरे जीवन में शिव जी का एक एहम स्थान है। मैं अपना सारा जीवन उनकी भगती में कुर्बान कर देना चाहता हूँ। उन्हों ने मेरे हर अच्छे बुरे बक्त में मेरा साथ दिया है। मेरे शिव भोले तो मेरी जान से भी प्यारे है। मै जब भी उनका जाप करता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है की वो मेरे साथ ही है। मेरा जीवन उनके बिना अधूरा है। मेरे शिव कालों के काल महाकाल है। उनकी लिला अपरम पार है।
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